जरा तय तो कर लो , किसकी चाहत है तुम्हें?जिसकी खातीर चल पड़े हो, पगडंडी से होकर कोरी सड़क पर ,
हर लम्हा आपने जीवन का, बिता रहें हो ऐसे ........
जैसे थका घोड़ा रेस का !
जरा तय तो कर लो किसकी चाहत है तुम्
अच्छा छोडों, एक सवाल है जो जरा खुद से पुछो ??
सुबह की किरणों से लेकर,रात के फैले काजल तक "'
ये जो तुम्हारी पलके हैं ,
कब -कब मुस्कान से झपकती हैं?
अगर ऐसा नही है तो,,
किसकी चाहत में तुम बनो हो रेस का घोड़ा .........??
अरे जरा सोचों चाहत उसकी करो ...........
जिसकी मंजिल का दामन तुम सजा सको !
जिसका किनारा न हो वो चाहत नही .............लालच है !
तो जरा रुको यू ही न ये जीवन बर्बाद करो .............
खुद भी हसो औरों को भी हसने दो ............
ख़ुशी के नगमो से ये जीवन की बगिया सजने दो ,
चाहत उतनी की करो !
जिसमें तुम और तुम्हारे कुटुम जी सकें ..........
वो चाहत क्यों करते हो जिसका अंत ही नही .......
आवों जरा तय तो कर लो ...........
किसकी चाहत है और क्यों ??
