"ज़रा सा देखो तो मुड़ के, वो रही निगोड़ी शिख,
गुलमोहर के रंग में लिपटी हुई।
कहती है— मैं तपकर खिल जाती हूँ,
घनी दोपहरी की तख़्त पर।
और तुम यूँ ही थक गए,
ज़िंदगी के आवागमन के क्रम में।"
Writing skill is one of the best way to generate the awareness in own soul and among the whole World. My Diary is a little galaxy of my thoughts which comes in my mind after conversation of heart and mind
Sunday, February 9, 2025
ख़्याल
Friday, February 7, 2025
ग़ज़ल
चाँद तनहा है, आसमा तनहा
बात निकली है जो दिल की तो दिल भी तनहा है |
चाँद तनहा है, आसमा तनहा
चाँद तनहा है , आसमा तनहा .....
बात निकली है जो दिल की तो दिल भी तनहा है |
चाँद तनहा है .................
इश्क की राह पर
चल रहे है जो कदम ,
चल रहे है साथ मगर फीर भी तनहा .......
चाँद तनहा है ............
आज भी हुश्न को देखकर
शायरी कहते है क्या ?
अब तो ग़ालिब की हवेली में
ग़ालिब तनहा ............
चाँद तनहा है ...........
ओश की बूंद पर
गर्म रेतो के निशा.......
तप रही है जम़ी प्यार की ,
और ख्वाईशे तनहा ......
चाँद तनहा है ,
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