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Sunday, February 9, 2025

ख़्याल


"ज़रा सा देखो तो मुड़ के, वो रही निगोड़ी शिख,
गुलमोहर के रंग में लिपटी हुई।
कहती है— मैं तपकर खिल जाती हूँ,
घनी दोपहरी की तख़्त पर।
और तुम यूँ ही थक गए,
ज़िंदगी के आवागमन के क्रम में।"


1 comment:

  1. गुलमोहर के रंग को थोड़ा और विस्तार होना लाज़िमी था.. मन की धूप में निखरे शब्द...

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thanks