ये जो आँखें है, सब जानती है"
ह्या की मेहँदी सी रंग बिखराती है,
पलकों के दामन में छुपकर हर बात कहती है,
कभी तो बचपन की पायल सी छमछम कर के ,
तोतली बोली से सब को रिझाती है,
और दुर कही बाजड़े के खेतो में ,
धुप की चुनरी लिए कौएँ उराती है!
ये जो आँखें है सब जानती है!
कभी तो चांदी की चमक बालो में सजाकर ,
डूबी हुई पतवारों को तजुर्बे के,
काजल से किनारा दिखलाती हैं ,
ये जो आँखें है, सब जानती हैं!
इतने पर भी इसे चैनं कहाँ ?
ये तो बावली बनकर कच्ची मिट्टी में घरौंदे तराशती हैं ,
नाजुक नाजुक बेलों पर सपनो का जूरा बनाती हैं,
ये जो आँखें है सब जानती हैं !
इन आँखो के गिरह में जीवन के भाव सिमटे हैं ,
ग़र होना है इन आँखों के पार तो
धीमे धीमे इन भावों को आपनी जीवन में उतारना,
क्योंकी ये आँखें है, सब जानती हैं!

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