ये जो तुम्हारा मैं
ये जो तुम और तुम्हारा मैं है , जरा सोचों कितना विशाल है ।
तुम्हे किसी और की नही; खुद की जरुरत है....
न जाओं तुम कही और ...बस थोरा थम लो,
आपने ही मन के छाव में।
माना की हर मन में सारगर नही निखर सकता ,
पर पनघट की घुंघट में कुमकुम तो सजा ही सकते हो ,
किनारे पर जब भी राहगीर तुम्हे पगडंडियों की राह दिखाये,
तो तुम अपनी कुमकुम से रंगोलियों की पथ सजा लेना ।
क्यों बस युही बिता देते हो जीवन रिश्तों की छन्नी में ?
कुछ और भीतो है तेरे अन्तरमन में"
पहले तो आपना आपा झाकियें ........
फिर मिलियें खुद से की आप हैं कौन?
पूरी दुनिया न सही - एक आसमान तो खुद को दिजीयें।
मैं जब जब गिरुगा तो खुद को फिर से खड़ा कर लुगा ,
ये तो अब मैं ,मेरे मैं से मिल चूका हु ....
तो सोचुगा नही ,रुकुगा नही बस चलता जाऊँगा .....
क्यों की मुझे पता हैं की एक छितिज है जो मेरा है
मैं जैसा भी हु वैसा ही सही
हैं आगांज ये,,
की मैं भी धरती तुझे कुछ देकर ही अपने रुक्सद का फरमान लुँगा
तो आओं जितने भी मैं हैं हम
'ये मंथन का मंच बनायें'
जो भी हैं उसी से खुद को निखारें
और
अपनी गुणों की एक एक वाटिका बनायें ।
Source : its my own thought

बहुत ही सारगर्भित और सुन्दर पोस्ट...
ReplyDeleteमन को छूते भाव....
अच्छा लिखती हैं आप......
ReplyDeleteभाव अच्छे हैं...
अनु